अधूरी मोहब्बत का तीसरा कोना | Romantic Hindi Love Story

 दिल्ली के एक छोटे से कैफ़े में हर शाम तीन लोग मिलते थे — आरव, निशा और कबीर।

आरव और निशा कॉलेज से ही रिलेशनशिप में थे। दोनों की जोड़ी देखकर लोग कहते, “यार, इनकी शादी तो पक्की है।”
लेकिन जिंदगी हमेशा सीधी लाइन में नहीं चलती।

कबीर, आरव का सबसे अच्छा दोस्त था। हंसमुख, समझदार और थोड़ा शायर टाइप। जब भी तीनों साथ होते, माहौल हल्का और मजेदार हो जाता।

एक दिन निशा ऑफिस से बहुत परेशान थी। आरव अपने काम में इतना बिज़ी था कि उसका फोन तक नहीं उठा पाया। तब कबीर ने घंटों निशा की बातें सुनीं।

“तुम हमेशा समझ लेते हो मुझे,” निशा ने मुस्कुराकर कहा।

कबीर बस हल्का सा हंसा, लेकिन उसके दिल में कुछ बदलने लगा था।

धीरे-धीरे निशा और कबीर की बातें बढ़ने लगीं। देर रात चैट, छोटी-छोटी मुलाकातें, और वो एहसास जिसे दोनों नजरअंदाज करना चाहते थे।


एक शाम बारिश हो रही थी। निशा और कबीर कैफ़े के बाहर खड़े थे।

“कभी-कभी लगता है, मैं गलत जगह प्यार ढूंढ रही हूं,” निशा ने धीमे से कहा।

कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“और अगर सही जगह बहुत पास हो तो?”

दोनों कुछ सेकंड चुप रहे। बारिश की आवाज़ के बीच दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी।

लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी।

आरव को धीरे-धीरे सब महसूस होने लगा था।
एक रात उसने सीधे कबीर से पूछा —

“तू निशा से प्यार करता है?”

कबीर की आंखें झुक गईं।
“मैंने कभी चाहा नहीं था ऐसा हो… लेकिन हां।”

कमरे में लंबी खामोशी छा गई।

आरव गुस्सा कर सकता था, दोस्ती तोड़ सकता था, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा —

“सबसे ज्यादा दर्द तब होता है, जब अपना ही इंसान दिल तोड़े।”

उधर निशा भी टूट चुकी थी।
वो आरव को छोड़ना नहीं चाहती थी, लेकिन अपने दिल की सच्चाई से भाग भी नहीं पा रही थी।

कई दिनों तक तीनों अलग रहे।

फिर एक दिन निशा ने दोनों को उसी पुराने कैफ़े में बुलाया।

“मैं किसी को धोखा देकर रिश्ता नहीं रखना चाहती,” उसने शांत आवाज़ में कहा।
“आरव, तुम मेरी आदत थे… लेकिन कबीर मेरी वो फीलिंग बन गया जिसे मैं रोक नहीं पाई।”

आरव की आंखें नम थीं, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की।

“प्यार ज़बरदस्ती नहीं होता,” उसने कहा।
“बस एक बात याद रखना… जिस रिश्ते की शुरुआत किसी के दर्द से होती है, उसे संभालना आसान नहीं होता।”

उस दिन तीनों अपनी-अपनी राह पर चले गए।

कुछ महीने बाद, कबीर और निशा साथ थे… लेकिन हर खुशी के पीछे एक हल्का सा अपराधबोध अब भी मौजूद था।

और आरव?

उसने फिर से जीना सीख लिया था।

क्योंकि कुछ कहानियां पूरी होकर नहीं, टूटकर इंसान को मजबूत बनाती हैं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ