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दिल्ली से प्रयागराज जाने वाली रात की ट्रेन हमेशा की तरह भरी हुई थी। प्लेटफॉर्म पर लोगों की भीड़, चाय वालों की आवाज़ और भागते हुए यात्री — सब मिलकर एक अलग ही माहौल बना रहे थे।
आरव जल्दी-जल्दी अपना बैग लेकर ट्रेन में चढ़ा। उसकी सीट खिड़की के पास थी। उसने राहत की सांस ली और बैग ऊपर रखकर बैठ गया। ऑफिस की लगातार भागदौड़ से वह बहुत थक चुका था। उसने सोचा, “चलो, इस सफर में थोड़ी शांति मिलेगी।”
ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म छोड़ने लगी। तभी अचानक एक लड़की भागते हुए ट्रेन में चढ़ी। उसके हाथ में बैग था और चेहरे पर हल्की घबराहट। वह सीट नंबर ढूंढते हुए आरव के सामने आकर रुकी।
“माफ कीजिए… सीट नंबर 36 यही है क्या?” उसने सांस संभालते हुए पूछा।
आरव ने टिकट देखा और मुस्कुराकर कहा, “हाँ, यही है।”
लड़की ने चैन की सांस ली और बैठ गई। उसके चेहरे पर थकान थी लेकिन आंखों में एक अलग चमक थी। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। सिर्फ ट्रेन की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
थोड़ी देर बाद चाय वाला आया।
“चाय… गरम चाय…”
आरव ने दो चाय ले ली और एक कप लड़की की तरफ बढ़ाया।
“अगर आपको बुरा न लगे तो…”
लड़की हल्का मुस्कुराई। “थैंक यू।”
“वैसे मैं आरव,” उसने कहा।
“और मैं नंदिनी।”
बस, वहीं से बातों का सिलसिला शुरू हो गया।
नंदिनी पहली बार दिल्ली आई थी इंटरव्यू देने। उसने बताया कि वह प्रयागराज में रहती है और अपने सपनों के लिए नौकरी ढूंढ रही है। आरव ध्यान से उसकी बातें सुन रहा था। उसकी सादगी और बात करने का तरीका आरव को अच्छा लग रहा था।
“तो इंटरव्यू कैसा गया?” आरव ने पूछा।
नंदिनी ने हल्की हंसी के साथ कहा, “पता नहीं… लेकिन मैंने पूरी कोशिश की।”
“कोशिश करने वाले लोग अक्सर जीत जाते हैं,” आरव ने मुस्कुराकर कहा।
रात बढ़ती जा रही थी। बाकी यात्री सो चुके थे, लेकिन उनकी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। कभी बचपन की बातें, कभी स्कूल की शरारतें, कभी सपनों की चर्चा।
नंदिनी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “मुझे ट्रेन का सफर बहुत पसंद है।”
“क्यों?” आरव ने पूछा।
“क्योंकि ट्रेन में लोग कुछ घंटों के लिए मिलते हैं, बातें करते हैं… और फिर शायद कभी नहीं मिलते। लेकिन कुछ लोग याद बन जाते हैं।”
उसकी यह बात आरव के दिल को छू गई।
अचानक तेज हवा के साथ बारिश शुरू हो गई। खिड़की से आती ठंडी हवा दोनों को अच्छी लग रही थी। नंदिनी ने हाथ बाहर निकालकर बारिश की बूंदों को महसूस किया।
“बारिश और ट्रेन… परफेक्ट कॉम्बिनेशन,” उसने हंसते हुए कहा।
आरव बस उसे देखता रह गया।
सुबह होने लगी थी। ट्रेन अपने आखिरी स्टेशन के करीब पहुंच रही थी। धीरे-धीरे दोनों के चेहरे पर एक अजीब सी खामोशी आने लगी।
शायद दोनों समझ चुके थे कि यह सफर अब खत्म होने वाला है।
“आपसे मिलकर अच्छा लगा,” नंदिनी ने धीरे से कहा।
“मुझे भी,” आरव बोला।
ट्रेन स्टेशन पर रुकी। लोग जल्दी-जल्दी उतरने लगे। नंदिनी ने अपना बैग उठाया और जाने लगी। तभी आरव ने अचानक कहा—
“एक मिनट…”
नंदिनी पलटकर देखने लगी।
“क्या हम… फिर कभी मिल सकते हैं?”
नंदिनी कुछ पल चुप रही। फिर मुस्कुराकर बोली, “अगर किस्मत ने चाहा तो जरूर।”
यह कहकर वह भीड़ में कहीं खो गई।
आरव काफी देर तक प्लेटफॉर्म पर खड़ा उसे ढूंढता रहा, लेकिन वह नजर नहीं आई।
उस दिन के बाद जिंदगी फिर पहले जैसी हो गई। ऑफिस, काम और वही रोज की भागदौड़। लेकिन अब हर ट्रेन की आवाज़ उसे उस सफर की याद दिला देती थी।
कई बार उसने सोचा कि काश उसने नंदिनी का नंबर ले लिया होता। लेकिन शायद कुछ मुलाकातें अधूरी ही अच्छी लगती हैं।
करीब छह महीने बाद आरव एक कैफे में बैठा कॉफी पी रहा था। तभी पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—
“एक्सक्यूज मी… ये सीट खाली है क्या?”
आरव ने पलटकर देखा और उसकी आंखें हैरानी से बड़ी हो गईं।
“नंदिनी…?”
नंदिनी मुस्कुराने लगी। “तो आखिर मिल ही गए हम।”
आरव को यकीन ही नहीं हो रहा था।
“तुम यहाँ?”
“दिल्ली में नौकरी लग गई,” उसने खुशी से कहा। “आज पहला दिन था ऑफिस का।”
“वाह… कॉन्ग्रैचुलेशन्स!”
दोनों फिर हंस पड़े। ऐसा लग रहा था जैसे वो ट्रेन वाला सफर अभी कल की ही बात हो।
“वैसे,” नंदिनी ने शरारती अंदाज में कहा, “इस बार नंबर ले लेना… वरना फिर किस्मत के भरोसे रहना पड़ेगा।”
दोनों जोर से हंस पड़े।
उस दिन के बाद उनकी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कभी कॉफी, कभी लंबी बातें, कभी बारिश में घूमना। धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ गए।
एक शाम वही बारिश हो रही थी जैसी उस ट्रेन वाले सफर में हुई थी। दोनों मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़े थे।
आरव ने धीरे से कहा, “तुम्हें पता है, उस रात ट्रेन में मुझे लगा था कि शायद मैं तुम्हें फिर कभी नहीं देख पाऊंगा।”
नंदिनी मुस्कुराई। “लेकिन कुछ लोग सिर्फ याद बनने नहीं आते… वो जिंदगी बन जाते हैं।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
बारिश लगातार हो रही थी, लेकिन उस पल दोनों को सिर्फ एक-दूसरे की मुस्कान दिखाई दे रही थी।
कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत कहानियां अचानक शुरू होती हैं। बिना किसी प्लान के… बिल्कुल उस ट्रेन वाली मुलाकात की तरह।


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