प्रयागराज के एक कॉलेज में नया सेशन शुरू हुआ था। कैंपस में हर तरफ नए चेहरे, नई दोस्ती और नई कहानियाँ बन रही थीं। उन्हीं चेहरों में एक था आरव का — थोड़ा शांत, थोड़ा शर्मीला, लेकिन दिल का बहुत अच्छा लड़का।
दूसरी तरफ थी निशा। हँसमुख, बातूनी और पूरे कॉलेज की फेवरेट लड़की। जहाँ निशा होती, वहाँ हँसी अपने आप आ जाती।
पहली बार दोनों की मुलाकात लाइब्रेरी में हुई।
आरव अपनी नोटबुक ढूँढ रहा था और गलती से निशा की कॉपी उठा लाया। अगले दिन क्लास में निशा बोली,
“Excuse me, मेरी कॉपी शायद आपके पास है।”
आरव घबरा गया।
“सॉरी… गलती से चली गई थी।”
निशा हँसते हुए बोली,
“कोई बात नहीं, वैसे हैंडराइटिंग अच्छी है आपकी।”
बस, वहीं से बात शुरू हो गई।
धीरे-धीरे दोनों साथ बैठने लगे। कैंटीन में चाय पीना, क्लास बंक करके कैंपस में घूमना, और एग्जाम से पहले एक-दूसरे को पढ़ाना… सब कुछ किसी फिल्म जैसा लगने लगा।
एक दिन बारिश हो रही थी। पूरा कॉलेज भीग रहा था। निशा छत के नीचे खड़ी थी और आरव उसके लिए समोसे लेकर आया।
निशा मुस्कुराकर बोली,
“तुम हर बार सही टाइम पर कैसे आ जाते हो?”
आरव ने पहली बार दिल की बात बोल दी।
“क्योंकि मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास रहता है।”
कुछ सेकंड के लिए दोनों चुप हो गए। फिर निशा धीरे से मुस्कुराई।
“तो फिर इसे कहीं और मत जाने देना।”
उस दिन से दोनों का रिश्ता और गहरा हो गया।
लेकिन हर कहानी में एक मोड़ आता है।
फाइनल ईयर खत्म होने वाला था। निशा को दिल्ली में नौकरी मिल गई, और आरव प्रयागराज में ही अपने परिवार के बिजनेस में मदद करना चाहता था।
स्टेशन पर दोनों खामोश खड़े थे।
निशा की आँखें नम थीं।
“लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन आसान नहीं होता…”
आरव ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“प्यार अगर सच्चा हो, तो दूरी सिर्फ किलोमीटर होती है, दिलों में नहीं।”
ट्रेन चलने लगी।
निशा खिड़की से हाथ बाहर निकालकर बोली,
“इंतज़ार करोगे?”
आरव मुस्कुराया।
“पूरी जिंदगी।”
दो साल बाद…
उसी कॉलेज के कैंपस में एक शादी हो रही थी।
दूल्हा था आरव… और दुल्हन थी निशा।
लाइब्रेरी में शुरू हुई वो छोटी सी कहानी आखिरकार हमेशा के लिए पूरी हो गई।
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